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सन्त की चेतावनी

15 नवम्बर

कबीर गर्ब न कीजिये , चाम लपेटी हाड़ । हयबर ऊपर छत्रवट , तो भी देवे गाड़ ।
कबीर गर्ब न कीजिये , ऊँचा देखि अवास । काल परो भुंइ लेटना , ऊपर जमसी घास ।
कबीर गर्ब न कीजिये , इस जीवन की आस । टेसू फूला दिवस दस , खंखर भया पलास ।
कबीर गर्ब न कीजिये, काल गहे कर केस । ना जानो कित मारिहे , कया घर क्या परदेस ।
कबीर मन्दिर लाख का, जड़िया हीरा लाल । दिवस चारि का पेखना, विनशि जायगा काल ।
कबीर धूल सकेलि के, पुड़ी जो बांधी येह । दिवस चार का पेखना, अन्त खेह की खेह ।
कबीर थोड़ा जीवना, माढे बहुत मढ़ान । सबही ऊभ पन्थ सिर, राव रंक सुल्तान ।
कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय । यह पुर पटृन यह गली, बहुरि न देखहु आय ।
कबीर गर्ब न कीजिये, जाम लपेटी हाड़ । इक दिन तेरा छत्र सिर, देगा काल उखाड़ ।
कबीर यह तन जात है, सके तो ठोर लगाव । के सेवा कर साधु की, के गुरु के गुन गाव ।
कबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं काल । चेति सके तो चेत ले, मीच परी है ख्याल ।
कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि । खेत बिचारा क्या करे , धनी करे नहिं बारि ।
कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल । दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल ।
कबीर सपने रैन के , ऊधरी आये नैन । जीव परा बहू लूट में , जागूं लेन न देन ।
कबीर जन्त्र न बाजई, टूट गये सब तार । जन्त्र बिचारा क्या करे, गया बजावन हार ।
कबीर रसरी पांव में , कहं सोवे सुख चैन । सांस नगारा कूच का , बाजत है दिन रैन ।
कबीर नाव तो झांझरी , भरी बिराने भाए । केवट सो परचे नहीं , क्यों कर उतरे पाए ।
कबीर पाँच पखेरूआ , राखा पोष लगाय । एक जु आया पारधी , लइ गया सबे उड़ाय ।
कबीर बेड़ा जरजरा , कूड़ा खेनहार । हरूये हरूये तर गये , बूड़े जिन सिर भार ।
एक दिन ऐसा होयगा , सबसों परे बिछोह । राजा राना राव एक , सावधान क्यों नहिं होय ।
ढोल दमामा दुरबरी , सहनाई संग भेरि । औसर चले बजाय के, है कोई रखे फेरि ।
मरेंगे मर जायेंगे , कोई न लेगा नाम । ऊजड़ जाय बसायेंगे , छेड़ि बसन्ता गाम ।
कबीर पानी हौज का, देखत गया बिलाय । ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय ।
कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक । कान पकर के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ।
के खाना के सोवना, और न कोई चीत । सतगुरु शब्द बिसारिया, आदि अन्त का मीत ।
हाड़ जरे जस लाकड़ी, केस जरे ज्यों घास । सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास ।
आज काल के बीच में, जंगल होगा वास । ऊपर ऊपर हल फिरे, ढोर चरेंगे घास ।
ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार । रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार ।
पाव पलक की सुध नहीं, करे काल का साज । काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज ।
आछे दिन पाछे गये, गुरु सों किया न हेत । अब पछतावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत ।
आज कहे मैं कल भजूँ, काल फिर काल । आज काल के करत ही, औसर जासी चाल ।
कहा चुनावे मेड़िया, चूना माटी लाय । मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ।
सातों शब्द जु बाजते, घर घर होते राग । ते मन्दिर खाली पड़े, बैठन लागे काग ।
ऊँचा महल चुनाइया, सुबरन कली ढुलाय । वे मन्दिर खाले पड़े, रहे मसाना जाय ।
ऊँचा मन्दिर मेड़िया, चला कली ढुलाय । एकहि गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ।
ऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल । एक गुरु के नाम बिन, जम मरेंगे रोज ।
पाव पलक तो दूर है, मो पे कहा न जाय । ना जानो क्या होयगा, पाव के चौथे भाय ।
मौत बिसारी बाहिरा, अचरज कीया कौन । मन माटी में मिल गया, ज्यों आटा में लौन ।
घर रखवाला बाहिरा, चिड़िया खाई खेत । आधा परवा ऊबरे, चेति सके तो चेत ।
हाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार । अजहुँ झोला बहुत है, घर आवे तब जान ।
पकी हुई खेती देख के, गरब किया किसान । अजहुं झोला बहुत है, घर आवे तब जान ।
पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम । दिना चार के कारने, फिर फिर रोके ठाम ।
कहा चुनावे मेड़िया, लम्बी भीत उसारि । घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि ।
यह तन काचा कुंभ है, लिया फिरे थे साथ । टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ ।
कहा किया हम आयके, कहा करेंगे जाय । इत के भये न ऊत के, चाले मूल गंवाय ।
जनम मरन विचार के, कूरे काम निवारि । जिन पंथा तोहि चालना, सोई पंथ संवारि ।

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